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नौवारी नखरा

नौ गज़, और पहनने का तरीक़ा ही अलग।

नौवारी सिर्फ़ लपेटी नहीं जाती, वह काछा बाँधकर पहनी जाती है। चुन्नटें पैरों के बीच से निकालकर पीछे खोंस दी जाती हैं, जिससे कपड़ा लहँगे की तरह नहीं, धोती की तरह बैठता है। अंदर पेटीकोट नहीं, थामने के लिए बस वही खोंस।

घोड़े पर बैठने, खेत में काम करने और दिन भर चलने-फिरने के लिए यही साड़ी पहनी जाती थी — और आज भी मंगलागौरी, गौरी और शादी के दिन वही पहनी जाती है।

७ साड़ियाँ